बांग्लादेश में महिलाओं की सुरक्षा का सच सियासी बदलाव के बाद भी क्यों नहीं बदली तस्वीर

बांग्लादेश में महिलाओं की सुरक्षा का सच सियासी बदलाव के बाद भी क्यों नहीं बदली तस्वीर

सत्ता बदली, चेहरे बदले, वादे नए किए गए, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त जस की तस बनी हुई है। क्या किसी भी देश में नेतृत्व परिवर्तन से आधी आबादी का डर कम हो जाता है? बांग्लादेश के ताज़ा आंकड़े इस सवाल का बेहद डरावना जवाब देते हैं। राजनीतिक उथल-पुथल और प्रधानमंत्री तारिक रहमान के सत्ता संभालने के बाद भी महिलाओं और बच्चियों के खिलाफ होने वाले अपराधों में कोई कमी नहीं आई है।

बांग्लादेश महिला परिषद की एक हालिया रिपोर्ट ने देश की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जनवरी से जुलाई के बीच के आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा की रफ्तार थमने का नाम नहीं ले रही है। जब तक सिस्टम की नीयत और ज़मीनी अमले में कड़ाई नहीं होगी, कागजी दावे खोखले ही साबित होंगे।

आंकड़ों का आईना और भयावह सच

सिर्फ सात महीनों के भीतर महिलाओं और बच्चियों पर जुल्म की हदें पार हो गईं। सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, इस साल के शुरुआती सात महीनों में हिंसा के कुल 1,667 मामले दर्ज किए गए। ये सिर्फ गिनती नहीं हैं, बल्कि समाज की उस सड़ांध को दिखाते हैं जो हर दौर में सुरक्षित बच जाती है।

  • इस अवधि में 258 महिलाओं और 83 बच्चियों की निर्मम हत्या कर दी गई।
  • 292 महिलाओं और लड़कियों को गंभीर बदसलूकी और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा।
  • कम से कम 31 ऐसी घटनाएं सामने आईं जिनमें दुर्व्यवहार के ठीक बाद पीड़िताओं की हत्या कर दी गई।

हैरानी की बात यह है कि ये सारे आंकड़े सिर्फ 14 प्रमुख अखबारों की रिपोर्ट पर आधारित हैं। ज़रा सोचिए, देश के छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों के वे तमाम मामले जिनकी रिपोर्टिंग तक नहीं हो पाती, यदि उन्हें जोड़ लिया जाए तो यह तस्वीर कितनी डरावनी होगी।

ढाका की सड़कों पर गूंजा विरोध

इन डरावने आंकड़ों के सामने आने के बाद ढाका में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों ने एक बड़ी मानव श्रृंखला (Human Chain) बनाकर कड़ा विरोध प्रदर्शन किया। महिला परिषद की अध्यक्ष फौजिया मोस्लेम और महासचिव मालेका बानू ने दो टूक शब्दों में कहा कि सिर्फ सरकार बदलने या मंत्रियों के बयान देने से महिलाओं का जीवन सुरक्षित नहीं हो सकता।

समस्या सिर्फ कानून की किताबों में कमियों की नहीं है, बल्कि उस मानसिकता की है जो सदियों से पुरुष प्रधान समाज में पनपती रही है। जब तक अपराधियों के मन में कानून का डर और सजा की निश्चितता पैदा नहीं होगी, तब तक हालात नहीं बदलेंगे।

सिर्फ कानून काफी नहीं, सिस्टम की इच्छाशक्ति जरूरी है

हर बार इस तरह की रिपोर्ट्स आने के बाद प्रशासन कुछ दिनों की कागजी कार्रवाई करता है और मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। राजनीतिक बदलाव के इस दौर में बांग्लादेश की नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती कानून-व्यवस्था को दुरुस्त करने की है। मानवाधिकार संगठनों ने साफ मांग की है कि महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में त्वरित न्याय सुनिश्चित किया जाए और पुलिस प्रशासन की जवाबदेही तय हो।

अगर आधी आबादी ही अपने घरों और सड़कों पर सुरक्षित महसूस न करे, तो किसी भी देश की प्रगति का दावा पूरी तरह बेमानी है। बदलाव सिर्फ भाषणों में नहीं, बल्कि महफूज गलियों और सख्त अदालती फैसलों में दिखना चाहिए।

ES

Elijah Sanders

With expertise spanning multiple beats, Elijah Sanders brings a multidisciplinary perspective to every story, enriching coverage with context and nuance.