मिडिल ईस्ट में जंग की आग अब उस मुकाम पर पहुंच चुकी है जहां से दुनिया भर की रसोई और गाड़ियों का बजट बिगड़ने वाला है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से ईरानी बुनियादी ढांचे पर बमबारी की चेतावनी दी गई। इसके जवाब में ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाकर गालिबाफ ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक ऐसा बयान जारी किया जिसने अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में हड़कंप मचा दिया। गालिबाफ ने दो टूक शब्दों में कहा कि इस युद्ध का समीकरण अब 'सब कुछ या कुछ भी नहीं' वाला बन गया है। उन्होंने साफ चेतावनी दी कि जिस क्षेत्र में ईरान अपना कच्चा तेल नहीं बेच पाएगा, वहां किसी भी अन्य देश को तेल बेचने नहीं दिया जाएगा।
होर्मुज जलडमरूमध्य यानी स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) दुनिया का सबसे अहम समुद्री ऊर्जा गलियारा है। वैश्विक स्तर पर समुद्र के रास्ते होने वाले कुल कच्चे तेल के परिवहन का लगभग पांचवां हिस्सा यानी 20% इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरता है। ईरान अगर इस रास्ते में किसी भी प्रकार की पूर्ण या आंशिक नाकेबंदी करता है, तो इसका सीधा असर सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और इराक जैसे प्रमुख तेल उत्पादक देशों के निर्यात पर पड़ेगा। Also making news in related news: What The Telford Bus Hijack And Attack On A Sikh Driver Reveals About Public Safety.
ट्रंप की चेतावनी और गालिबाफ का कड़ा पलटवार
अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य तनाव हाल के दिनों में तेजी से बढ़ा है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) द्वारा दक्षिणी ईरान में लगातार हवाई हमले किए जा रहे हैं। वॉशिंगटन ने आरोप लगाया है कि ईरान की ओर से होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले व्यावसायिक जहाजों को निशाना बनाया जा रहा है।
इसके जवाब में डोनाल्ड ट्रंप ने सीधे तौर पर चेतावनी दी थी कि यदि ईरान किसी भी कमर्शियल शिप पर मिसाइल, रॉकेट या ड्रोन से हमला करता है, तो अमेरिकी सेना ईरान के किसी एक पुल या पावर प्लांट को तबाह कर देगी। Further insights into this topic are detailed by NPR.
इसी धमकी के बाद ईरानी संसद के अध्यक्ष गालिबाफ का कड़ा बयान आया। उन्होंने कहा कि यदि ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा की गारंटी नहीं दी जाती है, तो खाड़ी क्षेत्र में कोई भी ढांचा सुरक्षित नहीं रहेगा। गालिबाफ ने यह भी स्पष्ट किया कि होर्मुज जलडमरूमध्य में हालात अब युद्ध से पहले वाली स्थिति में कभी नहीं लौटेंगे। उनके अनुसार इस समुद्री मार्ग की सुरक्षा केवल तभी संभव है जब अमेरिकी सेनाएं इस इलाके से पूरी तरह बाहर हो जाएं।
वैश्विक तेल बाजार और भारत पर संभावित असर
खाड़ी देशों में बढ़ते इस तनाव ने ब्रेंट क्रूड की कीमतों को पहले ही अस्थिर कर दिया है। तेल की कीमतें हालिया कारोबार में प्रति बैरल 95 डॉलर के स्तर को पार कर गईं। विश्लेषकों का मानना है कि यदि इस जलमार्ग से सप्लाई पूरी तरह ठप होती है, तो कच्चे तेल की कीमत 120 से 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है।
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है, जिसमें से एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने का सीधा असर भारत पर पड़ेगा।
- भारत में पेट्रोल और डीजल के दामों में भारी बढ़ोतरी हो सकती है।
- माल ढुलाई महंगी होने से आम उपभोक्ता वस्तुओं और खाद्यान्न के दाम बढ़ेंगे।
- भारतीय रिजर्व बैंक के लिए महंगाई को नियंत्रित करना कठिन हो जाएगा।
- देश का चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) तेजी से बढ़ेगा।
सऊदी अरब जैसे देश अपने तेल को लाल सागर में स्थित यानबू (Yanbu) बंदरगाह के रास्ते भेजने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन लाल सागर और बाब अल-मंदब जलडमरूमध्य के आसपास हुती विद्रोहियों के हमलों के कारण वह रास्ता भी सुरक्षित नहीं माना जा रहा है। अगर टैंकरों को अफ्रीका के उत्तमाशा अंतरीप (Cape of Good Hope) का चक्कर लगाकर जाना पड़ा, तो शिपिंग का समय तीन हफ्ते बढ़ जाएगा और भाड़ा कई गुना महंगा हो जाएगा।
आगे की राह और कूटनीतिक चुनौतियां
इस संकट का तात्कालिक सैन्य समाधान नजर नहीं आ रहा है। अमेरिकी हमलों और ईरान के पलटवार से दोनों पक्षों के बीच कूटनीतिक बातचीत के रास्ते लगभग बंद हो चुके हैं। जब तक वाशिंगटन और तेहरान के बीच प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष बातचीत शुरू नहीं होती, तब तक होर्मुज जलडमरूमध्य पर संकट के बादल छाए रहेंगे।
वैश्विक निवेशकों और ऊर्जा आयात करने वाले देशों को अब अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लानी होगी और रणनीतिक तेल भंडार को मजबूत करना होगा।